Qatle-e-Umeed ! “कत्ले-ए-उम्मीद: एक संघर्ष भरी कविता”

Qatle e Umeed  “पढ़िए ‘कत्ले-ए-उम्मीद’ ! Qatle-e-Umeed’ हिंदी कविता, जो उम्मीदों और चाहतों की तड़प और दर्द को बयां करती है। यह कविता उस दर्द को चित्रित करती है जब हसरतें और तमन्नाएं राख में बदल जाती हैं।”

 

“कत्ले-ए-उम्मीद”

“जल कर राख हो जाती हैं, ‘चाहतें’
जब क़त्ल हो जाते हैं, ‘उम्मीदों’ के”

हसरतें, हसरतें ही रह जाती हैं,
तमन्नाओं के मिट जाने से।

कितनी मुश्किल से बढ़ता है कोई ‘क़दम’
कुछ कर गुजरने के लिए।

कितनी हिम्मत से आती है
‘कोई हिम्मत’
हार को हारने के लिए।

हिम्मत टूट जाती है, तब
कोशिश रुक जाती है, जब
जब मंजिल के पास आते ही
मंजिल दूर हो जाती है।

छाती घुटन में घुट जाती है,
आँखें आँसुओं से भर जाती हैं।

आग लग जाती है ‘दिल’ में,
और मन भी रोने लगता है।
मन भी रोने लगता है, जब

“जल कर राख हो जाती हैं, ‘चाहतें’
जब क़त्ल हो जाते हैं, ‘उम्मीदों’ के”

 

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जुकने से कोई गुलाम नहीं होता है जो “सर उठाने” के लिए जुकता है वही “महान” होता है |

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