Besahara
वो उजालों में रहकर भी,
उजाला ढूंढ़ते हैं।
कभी भूखे तो कभी,
प्यासे ही सो जाते हैं।
वो हँसते हुए भी,
खुशी को ढूंढ़ते हैं।
कभी खुद को, तो कभी,
अपनों को ढूंढ़ते हैं।
वो जागते हुए भी,
ख्वाबों को ढूंढ़ते हैं।
और सोते हुए,
नींद को ढूंढ़ते हैं।
क्या करें वो बेचारे,
किनारे में रहकर भी,
एक किनारा ढूंढ़ते हैं।
खुले आसमान में कभी,
छत तो कभी छाता ढूंढ़ते हैं।
बस दूसरों की खुशी में,
अपनी हँसी ढूंढ़ते हैं।
ग़म के मारे वो,
एक सहारा ढूंढ़ते हैं।
दर्द के मारे वो कभी,
दवा तो कभी दुआ ढूंढ़ते हैं।
हर रोज़ यूँ ही वो,
सवेरे से
एक सवेरा ढूंढ़ते हैं।
और शाम होने से पहले,
एक उजाला ढूंढ़ते हैं।
गीत
जब आँखें बंद हों फिर भी नींद ना आए,
तो समझ लेना, दिल कहीं भटक रहा है।
वो जो दिखते हैं हँसते, वो भीतर रोते हैं,
हर कोई यहाँ बस किसी को खोते हैं।
हर कोई कुछ ढूंढ़ रहा है…
चलते हैं मगर कहीं रुक भी जाते हैं,
भीड़ में रहते हैं पर खो जाते हैं।
कुछ रिश्ते साए से होते हैं,
जो साथ होते हुए भी दूर होते हैं।
हर कोई कुछ ढूंढ़ रहा है…
ज़िंदगी में सुकून की तलाश है सबको,
कोई मुस्कान ढूंढ़ रहा है, कोई सबब को।
वक़्त चुपचाप सब ले जाता है,
और इंसान बस उम्मीद से बंधा रह जाता है।
हर कोई कुछ ढूंढ़ रहा है…
कुछ सवाल हैं जिनका जवाब नहीं,
कुछ रास्ते हैं जो मंज़िल नहीं।
पर फिर भी चल रहे हैं हम सब,
क्योंकि हर कोई कुछ ढूंढ़ रहा है…
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